होर्मुज स्ट्रेट में स्थिति गंभीर है। वहां ग्यारह हजार से ज्यादा नाविक फंसे हैं। यह कोई मामूली बात नहीं है। जब अंतरराष्ट्रीय शिपिंग रूट बंद होते हैं, तो दुनिया की रफ्तार थम जाती है। लोग अक्सर तेल की कीमतों पर बात करते हैं। लेकिन उन इंसानों का क्या जो हफ्तों से समुद्र के बीच फंसे हैं? उनके पास सीमित राशन है। मानसिक तनाव बढ़ रहा है। अब इन नाविकों को सुरक्षित निकालने के प्लान पर काम शुरू हुआ है। पर यह काम इतना आसान नहीं है।
सुरक्षा एजेंसियां और विभिन्न देशों की सरकारें अब हरकत में आई हैं। वे मिलकर एक रेस्क्यू ब्लूप्रिंट तैयार कर रही हैं। इस स्ट्रेट से हर दिन वैश्विक कच्चे तेल का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है। इसलिए यहां का संकट सीधे आपकी जेब पर असर डालता है। पर इस समय प्राथमिकता इंसानी जानों को बचाना है।
संकट की असली वजह और फंसे हुए जहाज
इस गतिरोध के पीछे भू-राजनीतिक तनाव है। क्षेत्रीय विवादों के कारण व्यापारिक जहाजों को आगे बढ़ने की अनुमति नहीं मिल रही। कई कार्गो शिप्स और ऑयल टैंकर्स कतार में खड़े हैं। जब आप समुद्र में फंसते हैं, तो संसाधन तेजी से खत्म होते हैं। पीने का पानी और मेडिकल सप्लाई की कमी सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है।
शिपिंग कंपनियों पर दबाव बढ़ रहा है। वे बीमा खर्च और क्रू की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। कुछ कंपनियां अपने जहाजों का रास्ता बदलने की सोच रही हैं। लेकिन रूट बदलने का मतलब है लंबा सफर और करोड़ों का अतिरिक्त खर्च।
नाविकों की सुरक्षा के लिए बनाए गए नए प्रोटोकॉल
राहत कार्य शुरू हो चुका है। पहले चरण में जहाजों तक जरूरी दवाइयां और खाना पहुंचाया जा रहा है। स्थानीय तटरक्षक बल और अंतरराष्ट्रीय नौसेना की टीमें समन्वय कर रही हैं। वे एक सुरक्षित गलियारा बनाने की कोशिश में हैं ताकि जहाजों को धीरे-धीरे बाहर निकाला जा सके।
नौसैनिक जहाजों को इन कमर्शियल शिप्स के साथ एस्कॉर्ट के रूप में भेजने की योजना है। इससे समुद्री लुटेरों या अन्य हमलों का खतरा कम होगा। सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि बिना सैन्य सुरक्षा के जहाजों को आगे बढ़ाना आत्मघाती होगा।
वैश्विक व्यापार पर इसका सीधा असर
दुनिया का ध्यान इस रूट पर टिका है। होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से सप्लाई चेन टूट जाती है। इसका सीधा असर एशिया और यूरोप के बाजारों पर पड़ता है। भारत जैसे देश जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर हैं, उनके लिए यह स्थिति चिंताजनक है।
आर्थिक नुकसान का आकलन करना मुश्किल है। हर बीतते दिन के साथ घाटा अरबों में पहुंच रहा है। मालगाड़ियां और बंदरगाह खाली पड़े हैं क्योंकि पीछे से शिपमेंट्स नहीं आ रहे।
सप्लाई चेन को बचाने के वैकल्पिक रास्ते
कुछ देश अब ओमान की खाड़ी या लाल सागर के रास्ते माल भेजने पर विचार कर रहे हैं। हालांकि इन रास्तों पर भी अपने खतरे और चुनौतियां हैं। जमीन के रास्ते परिवहन का विकल्प बहुत सीमित और महंगा है। पाइपलाइनों की क्षमता भी इतनी नहीं है कि वे अचानक बढ़े इस बोझ को संभाल सकें।
कंपनियों को अब अपनी रणनीति बदलनी होगी। उन्हें केवल एक ही रूट पर निर्भर रहना बंद करना होगा। बैकअप प्लान का होना अब ऐच्छिक नहीं बल्कि अनिवार्य हो गया है।
नाविकों के परिवारों की बढ़ती चिंताएं
घर पर बैठे परिवार परेशान हैं। उनसे संपर्क करना मुश्किल हो रहा है। सैटेलाइट फोन ही एकमात्र जरिया है, जो बेहद महंगा और कभी-कभी अनुपलब्ध होता है। नाविकों के मानसिक स्वास्थ्य पर इसका गहरा असर पड़ रहा है। महीनों तक एक ही जगह फंसे रहना किसी सजा से कम नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गेनाइजेशन इस स्थिति पर नजर रखे हुए हैं। वे सरकारों पर दबाव बना रहे हैं कि नाविकों को जल्द से जल्द वापस लाया जाए। नाविकों के अधिकारों की रक्षा के लिए बने कानूनों का सख्ती से पालन होना चाहिए।
इस संकट से निकलने के लिए तुरंत कदम उठाने होंगे। सबसे पहले फंसे हुए जहाजों को सुरक्षित ईंधन और भोजन की आपूर्ति सुनिश्चित करें। अपने स्थानीय दूतावासों से संपर्क बनाए रखें। यदि आप शिपिंग व्यवसाय से जुड़े हैं, तो अपने जहाजों की लाइव लोकेशन ट्रैक करें और सुरक्षा सलाहकारों के निर्देशों का पालन करें। जोखिम भरे क्षेत्रों में जाने से पहले पूरी सुरक्षा जांच अनिवार्य करें।